Sheetala Ashtami 2020 : शीतला अष्टमी व्रत चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है। इस व्रत के करने से व्रती के कुल में दाहज्वर, पीतज्वर, विस्फोटक ज्वर, दुर्गन्धयुक्त फोड़े, चेचक नेत्रों के समस्त रोग, शीतला की फुन्सियों चिह्न तथा शीतलाजनित दोष दूर हो जाते हैं। इस व्रत के करने से शीतलादेवी प्रसन्न होती हैं। इस वर्ष सोमवार 16 मार्च को अष्टमी दिन में 8:49 बजे से लग जा रही है जो मंगलवार 17 मार्च को दिन 8:46 बजे तक रहेगी। अतः उदया तिथि ग्राह्य होने से मंगलवार 17 मार्च को ही शीतलाष्टमी मनायी जाएगी। इस दिन प्रातः काल शीतल जल से स्नान कर

शीतला अष्टमी पर ये कार्य करने से मिलता है उत्तम फल

” मम गेहे शीतलारोगजनितोपद्रवप्रशमनपूर्वकायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धये शीतलाष्टमीव्रतमहं करिष्ये।”

इस मंत्र के जाप से संकल्प करें। इस व्रत की विशेषता है कि इसमें शीतला देवी को भोग लगाने वाले सभी पदार्थ एक दिन पूर्व ही बना लिये जाते हैं अर्थात् शीतला माता को एक दिन का बासी( शीतल) भोग लगाया जाता है। इसलिए लोगों के बीच यह व्रत बसौड़ा के नाम से भी प्रसिद्ध है। भोग के लिए मेवे, मिठाई, पूआ, पूरी, दाल, भात, लपसी, आदि एक दिन पहले से ही बनाये जातेे हैं, जिस दिन व्रत रहता है, उस दिन चूल्हा नही जलाया जाता। इस व्रत में रसोईघर की दीवार पर पांचो अंगुली घी में डुबोकर छापा लगाया जाता है। उस पर रोली, चावल चढ़ाकर शीतलामाता के गीत गाये जाते हैं।

चौराहे पर जल चढ़ा कर करें पूजन

सुगन्धित गन्ध- पुष्पादि से शीतला माता का पूजन कर ‘शीतलास्त्रोत’ का यथासम्भव पाठ करना चाहिए। शीतला माता की कहानी भी सुननी चाहिए। रात्रि में दीपक जलाने चाहिए। एक थाली में भात, रोटी, दही, चीनी, जल का गिलास, रोली, चावल, मूंग की दाल का छिलका, हल्दी, धूपबत्ती, तथा मोंठ, बाजरा, आदि रखकर, घर के सभी सदस्यों को स्पर्श कराकर शीतलामाता के मन्दिर में चढ़ाना चाहिए। इस दिन चौराहे पर भी जल चढ़ाकर पूजन करने का विधान है। फिर मोंठ- बाजरा का वायना निकालकर उस पर रुपया रखकर अपनी सासजी के चरणस्पर्श कर उन्हे देने की प्रथा है। इसके बाद किसी वृद्धा को भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिए।

शीतला अष्टमी से जुड़ी लोक कथा

किसी गांव में एक औरत रहती थी। वह बसौड़े के दिन शीतला माता की पूजा करती और ठंडी रोती खाती थी। उसके गांव में और कोई भी शीतला माता की पूजा नही करता था। एक दिन उस गांव में आग लग गई जिसमें उस औरत की झोपड़ी छोड़कर बाकी सबकी झोपड़ियां जलकर राख हो गईं। इससे सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। सब लोगों ने उस औरत से इस चमत्कार का कारण पूछा। उस औरत ने कहा कि मैं तो बसौड़े के दिन ठंडी रोती खाती हूं, तुम लोग यह काम नही करते थे। इससे मेरी झोपड़ी बच गई तुम लोगों की जल गई। तब से बसौड़े के दिन पूरे गांव में शीतला माता की पूजा होने लगी।

शीतला अष्टमी पर गाएं ये लोकगीत

मेरी माता को चिनिये चौबारो,

दूधपूत को चिनिये चौबारो।

कौन ने मैया ईंटे थपाई,

और कौन ने घोरौ है गारो।

श्रीकृष्ण ने मैया ईंटे थपाई,

दाऊजी घोरौ है गारौ।

मेरी माताको चिनिये चौबारो…।।

गीत गाते समय श्रीकृष्ण और दाऊ जी के स्थान पर अपने परिवार के सदस्यों के नाम लिए जाते हैं।

– ज्योतिषाचार्य पंडित गणेश प्रसाद मिश्र