कानपुर (इंटरनेट डेस्क)। शास्त्रों में मनुष्य के तीन ऋण कह गए हैं। देव ऋण, ऋषी ऋण व पितृ ऋण इनमे से पितृ ऋण को श्राद्ध करके उतारना आवश्यक है। ब्रह्मपुराण के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में यमराज यमपुरी से पितरों को मुक्त कर देते हैं और वे अपनी संतानों तथा वंशजों से पिंडदान लेने के लिए पृथ्वी पर आते हैं।सूर्य के कन्या राशि में आने के कारण ही आश्विन मास के कृष्णपक्ष का नाम “कनागत” पड़ गया क्योंकि सूर्य के कन्या राशि में आने पर पितृ पृथ्वी पर आकर अमावस्या तक घर के द्वार पर ठहरते हैं।भाद्र पद शुक्ल पूर्णिमा से प्रारम्भ करके आश्विन कृष्ण अमावस्या तक सोलह दिन पितरों का तर्पण और विशेष तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए।इस प्रकार करने से यथोचित रूप में “पितृ व्रत” पूर्ण होता है।

शास्त्रों में 12 प्रकार के श्राद्ध का वर्णन मिलता है
नित्य-श्राद्ध, नैमित्तिक- श्राद्ध , काम्य-श्राद्ध , वृद्धि-श्राद्ध, सापिण्ड-श्राद्ध, पार्वण-श्राद्ध , गोष्ठ-श्राद्ध, शुद्धि-श्राद्ध , कर्माग-श्राद्ध, दैविक-श्राद्ध, औपचारिक-श्राद्ध तथा सांवत्सरिक-श्राद्ध। सभी श्राद्धों में सांवत्सरिक श्राद्ध सबसे श्रेष्ठ है,इसे मृत व्यक्ति की तिथि पर करना चाहिए।

श्राद्ध में 7 महत्वपूर्ण चीजें आवश्यक हैं
दूध,गंगाजल, मधु,तसर का कपड़ा,दौहित्र,कुतप काल(दिन का आठवां मुहूर्त) और तिल

श्राद्ध में लोहे के पात्र सर्वथा निषेध
श्राद्ध में लोहे के पात्र का प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए। सोने,चांदी,कांसे और तांबे के पात्र पूर्ण रूप से उत्तम हैं।केले के पत्ते में श्राद्ध भोजन सर्वथा निषिद्ध है। मुख्य रूप से श्राद्ध में चांदी का विशेष महत्व दिया गया है।

मुहूर्त ज्योतिष के अनुसार अपराह्न पितृ कार्यों के लिए,पूर्वाह्न देव कार्यों के लिए प्रशस्त माना गया है। एकोदिष्ट श्राद्ध में मध्याह्न तथा पार्वण श्राद्ध में अपराह्न को ग्रहण किया जाता है। यही कारण से श्राद्ध पक्ष में अपराह्न व्यापिनी तिथि को ग्राह्म किया जाता है। पितरों की प्रतिमा की प्रतिष्ठा मघा, रोहिणी,मृगशिरा एवं श्रवण नक्षत्र में रविवार, सोमवार एवं गुरुवार में तथा वृषभ,सिंह एवं कुम्भ लग्न में प्रशस्त माना गया है।

ज्योतिषाचार्य पं राजीव शर्मा।
बालाजी ज्योतिष संस्थान, बरेली।