कार्तिक मास की अमावस्या को दिवाली मनाई जाती है। जब असंख्य दिए अंधकार को दूर कर धरती को प्रकाश से भर देते हैं। इस वर्ष दीपावली 27 अक्टूबर को है। आइए आपको बताते हैं कि शास्त्रों व धर्मग्रंथों के अनुसार इस वर्ष दिवाली पर लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त कौन सा है।  

इस वर्ष श्री शुभ संवत् 2076 शाके 1941 रविवार 27 अक्टूबर को अमावस्या दिन में 11: 51 बजे से लग रही है जो प्रदोष काल में मिल रही है। दूसरे दिन  28 अक्टूबर को अमावस्या दिन में 9:44 बजे तक है, जो प्रदोष काल में नहीं मिल रही है।

दीपान्दत्त्वा प्रदोषे तु लक्ष्मीं पूज्य यथाविधि।

स्वलंकृतेन भोक्तव्यं सितवस्त्रोपशोभिना।।

अयं प्रदोषव्यापी ग्राह्य:।

निर्णय सिन्धु के इस वचनानुसार रविवार  27 अक्टूबर को दीपावली मनायी जायेगी। दीपावली के दिन श्री महागणपति, महालक्ष्मी एवं महाकाली की पौराणिक और तांत्रिक विधि से साधना-उपासना का विधान है। दिवाली के दिन उद्योग-धंधों के साथ-साथ नवीन कार्य करने एवं पुराने व्यापार में खाता पूजन का विशेष विधान है।

लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त

धर्म शास्त्रों में दीपावली के पूजन में प्रदोष काल अति महत्त्व पूर्ण होता है। धर्मशास्त्रोक्त दीपावली ‘प्रदोष काल एवं महानिशीथ काल व्यापिनी अमावस्या में है, जिसमें प्रदोष काल का महत्त्व गृहस्थों एवं व्यापारियों के लिए महत्त्वपूर्ण होता है और महानिशीथ काल का तान्त्रिकों के लिए उपयुक्त होता है।  इस साल अमावस्या व्यापिनी महानिशीथ काल प्राप्त हो रहा है। वैसे महानिशीथ काल की पूजा मध्यरात्रि 12:40 से 2:00 बजे के मध्य की जा सकती है।

क्या है प्रदोष काल

दिन-रात के संयोग काल को ही प्रदोष काल कहते है, जहां दिन विष्णु स्वरुप है वहीँ रात माता लक्ष्मी स्वरुपा है, दोनों के संयोग काल को ही प्रदोष काल कहा जाता है। इस प्रकार प्रदोष काल में दीपावली पूजन का श्रेष्ठ विधान है और प्रदोष काल में ही दीप प्रज्वलित करना उत्तम फल दायक होता है।

प्रदोष काल शाम 05:19 से 07:53 बजे तक रहेगा। पूजन एवं खाता पूजन हेतु शुभ मुहूर्त्त स्थिर लग्न वृश्चिक दिन  को 07:59 बजे से लेकर 10:16 तक, कुम्भ स्थिर लग्न दिन 2:09 से 3:40 तक, वृष स्थिर लग्न रात्रि 6:45 से 8:41 तक विद्यमान रहेगा।  स्थिर लग्न में पूजा करना लाभप्रद होता है। महानिशीथ काल में तान्त्रिक पूजन करने वालो के लिए इस दिन महानिशीथ काल लगभग रात 12:40 से 02:00 बजे तक व्याप्त रहेगा ।

-ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र