कानपुर (इंटरनेट डेस्क)। भीष्म पंचक व्रत पांच दिनों तक चलता है। यह देवउठनी एकादशी यानीइ 25 नवंबर से शुरु होकर 29 नवंबर को खत्म होगा। यह व्रत कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी से आरम्भ होकर पूर्णिमा को समाप्त होता है।इसलिये इसे “भीष्म पंचक” कहते हैं।जो स्त्रियां पूरे कार्तिक मास तक किसी पवित्र नदी अथवा सरोवर में स्नान नहीं कर पातीं, वे भी पांच दिन का यह पंचक स्नान तो करती ही हैं। पांच दिनों के इस व्रत को भीष्म ने भगवान वासुदेव से प्राप्त किया था।

कैसे रखा जाता है ये व्रत
इस व्रत में प्रथम दिन पांच दिन के व्रत का संकल्प लिया जाता है और देवताओं, ऋषियों और पितरों को श्रद्धा सहित याद किया जाता है। इस व्रत में लक्ष्मीनारायण जी की मूर्ति बनाकर उनका पूजन किया जाता है। इसमें प्रथम दिन भगवान के हृदय का कमल पुष्पों से, दूसरे दिन कटि प्रदेश का बिल्वपत्रों से,तीसरे दिन घुटनों का केतकी पुष्पों से,चौथे दिन चरणों का चमेली पुष्पों से तथा पांचवे दिन सम्पूर्ण अंग का तुलसी की मंजरी से पूजन किया जाता है।

पांच दिनों तक लगातार जलाएं दीपक
व्रती को प्रतिदिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का यथासंभव जाप करना चाहिए और पांचों दिनों तक लगातार घी का दीपक जलाना चाहिए।इसके बाद “ॐ विष्णुवे नमः स्वाहा” मंत्र से घी,तिल और जौ की 108 आहुतियां देकर अंतिम दिन हवन करना चाहिए। इस व्रत में पंचगव्य पान की विशेष महिमा है। व्रत के अंत मे ब्राह्मण दंपति को भोजन करवाना चाहिए।

व्रत से मिलने वाला फल
यह व्रत पापों के नाश,धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए किया जाता है।सामान्य स्नान और पूजा के स्थान पर जब यह क्रिया उपरोक्त विधि से की जाती है तब “भीष्म पंचक व्रत” कहलाती है।

ज्योतिषाचार्य पं राजीव शर्मा।
बालाजी ज्योतिष संस्थान,बरेली।